Soybean Pod Filling: सोयाबीन में दाना भरने का सही समय और जरूरी पोषण

Soybean Pod Filling: सोयाबीन में दाना भरने का सही समय और जरूरी पोषण

Soybean Pod Filling: सोयाबीन में दाना भरने का सही समय और जरूरी पोषण

सोयाबीन में अच्छी पैदावार के लिए केवल अधिक फलियां लगना पर्याप्त नहीं है। फलियों में अच्छे आकार के दाने भरना, दाने का वजन बनाए रखना और बीज की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। फली बनने के बाद की अवस्था में पौधे को पर्याप्त नमी के साथ पोटाश, सल्फर और आवश्यकता के अनुसार कैल्शियम जैसे पोषक तत्वों की उपलब्धता अच्छी हो तो दाना विकास की प्रक्रिया को बेहतर समर्थन मिलता है।

पोटाश की भूमिका

पोटाश यानी पोटेशियम सोयाबीन में प्रकाश संश्लेषण, पानी के संतुलन और पौधे के अंदर बने कार्बोहाइड्रेट के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दाना भरने की अवस्था में पत्तियों द्वारा बनाए गए पोषक पदार्थों का प्रभावी उपयोग बीज के विकास के लिए जरूरी होता है।

पोटाश पौधे को सूखे या पानी की कमी जैसी परिस्थितियों में तनाव सहने में भी मदद करता है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि पोटाश पानी की कमी की भरपाई नहीं कर सकता। खेत में नमी उपलब्ध होना दाना भरने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है।

सल्फर से तेल और प्रोटीन निर्माण को मिलता है आधार

सोयाबीन तिलहनी और प्रोटीनयुक्त फसल है, इसलिए सल्फर का महत्व विशेष है। सल्फर अमीनो अम्लों और प्रोटीन निर्माण से जुड़ी कई जैव रासायनिक प्रक्रियाओं में आवश्यक है।

पर्याप्त सल्फर मिलने पर पौधे की पोषण स्थिति और बीज की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। सोयाबीन में तेल प्रतिशत पर भी सल्फर का सकारात्मक प्रभाव कुछ परिस्थितियों में देखा गया है, लेकिन केवल सल्फर का छिड़काव करने से हर खेत में तेल प्रतिशत निश्चित रूप से बढ़ेगा, ऐसा मानना उचित नहीं है। इसका परिणाम मिट्टी, मौसम और पहले से उपलब्ध पोषक तत्वों पर निर्भर करता है।

कैल्शियम का दाना विकास में योगदान

कैल्शियम कोशिका विभाजन, कोशिका भित्ति के निर्माण और पौधे के ऊतक विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व है। इसलिए फली और बीज विकास के दौरान कैल्शियम की पर्याप्त उपलब्धता पौधे की सामान्य प्रजनन वृद्धि को समर्थन देती है।

कैल्शियम की कमी वाले खेतों में मिट्टी और फसल की स्थिति के अनुसार जिप्सम या कैल्शियम आधारित उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है। जिप्सम का विशेष लाभ यह है कि इससे कैल्शियम के साथ सल्फर भी मिलता है।

सोयाबीन में कौन सा पोटाश कब उपयोग करें?

फसल की अवस्था के अनुसार अलग-अलग पोटाश स्रोतों का उपयोग किया जा सकता है। यहां एक बात स्पष्ट है कि आधारभूत पोटाश की पूर्ति मिट्टी जांच के आधार पर मिट्टी में करना अधिक प्रभावी तरीका है, जबकि पर्णीय छिड़काव को आवश्यकता के अनुसार पूरक पोषण के रूप में देखा जाना चाहिए।

00:52:34 — मोनो पोटैशियम फॉस्फेट

00:52:34 को Mono Potassium Phosphate (MKP) यानी मोनो पोटैशियम फॉस्फेट कहा जाता है। इसमें 0% नाइट्रोजन, 52% फॉस्फोरस और 34% पोटाश होता है।

इसे मुख्य रूप से फूल आने से पहले तथा फूल और प्रारंभिक फलन अवस्था में उपयोग किया जा सकता है।

सामान्य पर्णीय मात्रा: 5–10 ग्राम प्रति लीटर पानी

यह अवस्था फसल की प्रजनन वृद्धि शुरू होने का समय है, इसलिए फॉस्फोरस और पोटाश की उपलब्धता पौधे के लिए उपयोगी रहती है।

13:00:45 — पोटेशियम नाइट्रेट

13:00:45 Potassium Nitrate यानी पोटेशियम नाइट्रेट है। इसमें 13% नाइट्रोजन और 45% पोटाश होता है।

यदि फसल में फली बन रही है, दाना विकसित हो रहा है और साथ में पानी की कमी या हल्का जल तनाव है, तो आवश्यकता के अनुसार इसका पर्णीय उपयोग किया जा सकता है।

सामान्य मात्रा: 1–1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी

इसमें नाइट्रोजन भी होने के कारण इसे आवश्यकता से अधिक या बार-बार नहीं देना चाहिए।

00:00:50 — सल्फेट ऑफ पोटाश

00:00:50 को Sulphate of Potash (SOP) यानी सल्फेट ऑफ पोटाश कहा जाता है। इसमें लगभग 50% पोटाश और लगभग 17–18% सल्फर होता है।

इसका उपयोग विशेष रूप से तब उपयोगी हो सकता है जब फली बनने के बाद फसल को पोटाश के साथ सल्फर की भी आवश्यकता हो।

पर्णीय उपयोग के लिए सामान्यत: 5–10 ग्राम प्रति लीटर पानी

की मात्रा उत्पाद की गुणवत्ता और लेबल के अनुसार रखी जा सकती है।

जब फलियां अच्छी तरह बन चुकी हों और दाना भरने की अवस्था शुरू हो गई हो, तब यह पोटाश और सल्फर दोनों की पूरक आपूर्ति का विकल्प बन सकता है।

एमओपी का उपयोग कब करें?

MOP यानी Muriate of Potash (Potassium Chloride) में लगभग 60% K₂O होता है। यह मुख्य रूप से मिट्टी में देने वाला पोटाश उर्वरक है।

यदि मिट्टी जांच में पोटाश की कमी है या फसल में प्रारंभिक पोटाश प्रबंधन पर्याप्त नहीं हुआ है, तो एमओपी का उपयोग मिट्टी में किया जा सकता है। इसे पर्याप्त नमी वाली मिट्टी में देना अधिक उचित है।

लगभग 20–25 किग्रा एमओपी प्रति एकड़ सुधारात्मक मात्रा के रूप में कुछ परिस्थितियों में उपयोग की जा सकती है, लेकिन वास्तविक मात्रा मिट्टी जांच, पहले दिए गए पोटाश और फसल की स्थिति के अनुसार तय करना बेहतर है।

एमओपी को खड़ी फसल पर पत्तियों के माध्यम से देने की बजाय मिट्टी में देना अधिक व्यावहारिक है

समुद्री शैवाल आधारित पोटाश उत्पादों की भूमिका

आज बाजार में Rhodophyta यानी लाल समुद्री शैवाल से प्राप्त कई पोषक एवं जैव-उत्तेजक उत्पाद उपलब्ध हैं। कुछ उत्पादों में समुद्री शैवाल के साथ पोटाश और सल्फर भी मिलाए जाते हैं। उदाहरण के लिए कुछ फॉर्मुलेशन में लगभग 20% पोटाश और 1.5% सल्फर का उल्लेख मिलता है।

लेकिन यह प्रतिशत हर समुद्री शैवाल उत्पाद में समान नहीं होता। इसलिए किसान को हमेशा उत्पाद के लेबल पर दिए गए वास्तविक पोषक तत्व और अनुशंसित मात्रा को देखकर ही उपयोग करना चाहिए।

ऐसे उत्पादों को मुख्य उर्वरकों का पूर्ण विकल्प न मानकर पूरक पोषण और जैव-उत्तेजक के रूप में देखना अधिक उचित है।

सोयाबीन में पोषण प्रबंधन का सरल चरणवार तरीका

फूल आने से पहले:
00:52:34 जैसे MKP का आवश्यकता अनुसार पर्णीय प्रयोग किया जा सकता है।

फूल और प्रारंभिक फली अवस्था:
फसल की पोषण स्थिति के अनुसार पोटाश और सल्फर की उपलब्धता पर ध्यान दें।

फली बनने और दाना विकसित होने की अवस्था:
यदि नमी की कमी के साथ पोटाश की आवश्यकता हो तो 13:00:45 का हल्का पर्णीय प्रयोग विकल्प हो सकता है।

पूरी फलियां लगने और दाना भरने की अवस्था:
00:00:50 यानी SOP का उपयोग पोटाश के साथ सल्फर की पूरक आपूर्ति के लिए किया जा सकता है।

मिट्टी में पोटाश की कमी:
MOP का उपयोग मिट्टी में, बेहतर रूप से पर्याप्त नमी की स्थिति में, मिट्टी जांच के अनुसार करें।

अंतिम बात किसानों के लिए

सोयाबीन में दाना भरने के लिए किसी एक उर्वरक को चमत्कारी समाधान मानना सही नहीं है। पोटाश दाने के विकास से जुड़ी पोषक पदार्थों की आवाजाही और जल-संतुलन में मदद करता है, सल्फर प्रोटीन एवं बीज की गुणवत्ता से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए जरूरी है और कैल्शियम पौधे के ऊतक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसलिए बेहतर परिणाम के लिए रणनीति होनी चाहिए:

मिट्टी जांच → संतुलित आधारभूत पोषण → पर्याप्त नमी → फसल की अवस्था के अनुसार पोटाश व सल्फर → आवश्यकता अनुसार कैल्शियम और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व।

याद रखें, दाना भरने की अवस्था में पौधा जितना स्वस्थ और उसकी पत्तियां जितनी अधिक सक्रिय रहेंगी, उतना ही वह उपलब्ध पोषक तत्वों और पानी का प्रभावी उपयोग कर पाएगा। इसलिए केवल अंतिम छिड़काव पर निर्भर रहने के बजाय पूरे फसल चक्र में संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाना अधिक वैज्ञानिक तरीका है।

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Saurav Gaikwad

Bsc Agri. From Dr. PDKV Akola Msc EVS. From Fergusson college Pune

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